कार्तिक महिने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा होती है। इस दिन संजात खीर बनाते है। भगवान की पूजा करके खीर और बानच को भोग लगाते है। खीर का प्रसाद खाते है। चांद की रोशनी में सुई पिरोते है। खीर और बानच को रात भर छत पर रखते है। दूसरे दिन सवेरे भी खीर खाते है।

शरद पूर्णिमा का दिन हिंदू धर्म में बहुत महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा की रात देवी लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करने निकलती हैं और अपने भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं। शरद पूर्णिमा का शुभ अवसर देवी लक्ष्मी को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि यदि आप इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तो आप उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं, और जीवन में धन की कमी नहीं होगी। आश्विन मास के पूर्णिमा तिथि कोई सामान्य दिन नहीं है। शरद पूर्णिमा का दिन चाँदनी सबसे चमकीली होती है। ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन, चंद्रमा सभी सोलह कलाओं के साथ अपनी पूर्ण महिमा में चमकता है।

इस दिन खीर का विशेष महत्व होता है। खीर को चांद की रोशनी में रखा जाता है। माना जाता है कि चंद्रमा की रोशनी में रखी हुई खीर खाने से उसका प्रभाव सकारात्मक होता है। यह खीर रोगियों को दी जाती है। कहा जाता है कि इस खीर से शरीर में पित्त का प्रकोप और मलेरिया का खतरा कम हो जाता है। अगर यह खीर किसी ऐसे व्यक्ति को खिलाई जाए जिसकी आंखों की रोशनी कम हो गई है तो उसकी आंखों की रोशनी में काफी सुधार आता है। हृदय संबंधी बीमारी और अस्थमा रोगियों के लिए भी यह खीर काफी लाभदायक है। चंद्रमा की रोशनी में इस दिन अगर कुछ समय के लिए बैठा जाए, तो आध्यतमिक लोभ होता है। रोगों से बचाव होता है इसलिए आज भी लोग इस दिन दूध से बनी खीर को चंद्रमा की रोशनी में कुछ समय रखते हैं और उसके बाद उसका सेवन करते हैं इसके द्वारा शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।
इस पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की उज्जवलता में अमृत का वास माना गया है। इस शुभ तिथि अवसर पर जहां चंद्रमा अपने चरम सौंदर्य को पाता है वहीं पृथ्वी को इस दिन अमृत वर्ष की प्राप्ति होती है। चंद्रमा की उज्जवल रोशनी के कण-कण में अमृत का वास होता है।

शरद पूर्णिमा की कहानी

एक साहूकार के दो बेटी थी। दोनों बहनें पूर्णिमा का व्रत करती थी। बड़ी बहन तो पूरा व्रत करती, छोटी अधूरा व्रत करती। अधूरा व्रत करने से उसका बच्चा होते ही मर जाता। एक दिन वो पंडित को बुलाकर पूछा कि मेरा बच्चा होते ही मर जाता, ऐसा क्यों??
पंडित बोला तू पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती है, जिस वजह से तेरा बाल जीवित नहीं रहता। उस दिन से छोटी बहन भी पूरा व्रत करने लगी। थोड़ा दिन बाद उसके लड़का हुआ, पर वो भी नहीं रहा। उसने मृत शिशु को पीड़ा पर लिटाकर कर ऊपर से कपड़ा उड़ा दिया और अपनी बहन को बुला कर, वही पीड़ा उसे बैठ ने के लिए दे दिया। वो जैसे ही बैठने लगी कि उसका घाघरा पकड़कर लड़का जीवित हो गया और रोने लगा। उसकी बड़ी बहन को बहुत आश्चर्य हुआ और वह बोली कि तू अपनी संतान को मारने का दोष मुझ पर लगाना चाहती थी। उसे कुछ हो जाता तो। तब  छोटी बहन बोली कि ये तो पहले से ही मरा हुआ था, यह तेरे ही भाग से जीवित हुआ है। हम दोनों पूर्णिमा का व्रत करते, तू पूरा व्रत करती और मैं अधूरा जिसके दोष के कारण मेरा बच्चा होते ही मर जाता। बस उसी दिन से यह व्रत विधिपूर्वक किया जाने लगा।
Karwa
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