दोस्ती
“उस रात की अगली सुबह को एहसास हुआ की दोस्तों के साथ बिताए हुए पल सदा के लिए मीठी सी यादें बनकर रह गए। ऐसा लग रहा था मानो ठहाको से भरी वो रात, जो बहुत सी यादें दे गई, आज वही थम जाए।
ज़िन्दगी की दौड़ में गुम हुए वो हसीन पल मानो फिर से जी लिए हो। बचपन की अमीरी के वो दिन, जहां बारिश के पानी में दोस्तों के जहाज़ चला करते थे, या जवानी की रवानी, जहां तीन की सीट पर चार लोग सवार बेफिक्र बादशाह बने घूमते थे – लौट आए थे।” हां, उस शाम दोस्ती के मायनों का दायरा समझ आया।
दोस्ती वो हसीन रिश्ता है जो अपनों की कमी महसूस नहीं होने देती। जहां हक भी होता है और नाराजगी भी। जहां शिकवे भी होते है और शिकायते भी। यह बाप की तरह फटकारते है तो मां की तरह दुलारते हैं। भाई की तरह सलाह करते है तो बहन की तरह रक्षा, और तो और, जीवन साथी की तरह झगड़ा कर मनाते भी है।
जीवन में कई बातें ऐसी होती है जो हम सिर्फ दिल खोल अपने दोस्तों से बोल मन हल्का करते है। जो दोस्त ना हो तो बेरंग हो जीवन जो अपने ना हो तो अकेला हो मन। ज़िन्दगी के हर पहलू पर हमारे दोस्त बनते है कुछ साथ रहते है कुछ वक़्त के साथ हमसे दूर हो जाते है। पर जो दोस्त सालों साल साथ रहे वो सदा के लिए आपको युवा बना देते है।
कुछ यार ऐसे बने जिन्होंने वक़्त के मोड़ पे भी ना छोड़ आ एक दूजे का साथ, निभाई ऐसे दोस्ती जो बन गई एक नई मिसाल। साथ बड़े हुए, साथ नौकरियां की, अपने-अपने गृहस्थ जीवन की जिममेदारियां भी बखूबी निभाई। पोता-पोती नाता- नातिन वाले  वो दोस्त आज भी ऐसे मिलते है मानो ४० साल पुराना दौर लौट आया हो। उसी दोस्ती को समर्पित चंद शब्द –
 
*दोस्ती – एक रिश्ता*
यह रिश्ता है एहसास का
यह रिश्ता है जज़्बात का
यह रिश्ता है अरमानों का
साथ लिए पैमानों का।
हर खुशी में जो साथ रहे
हर गम दिल के पास रहे
जिंदा दिल करे दोबारा
टूटे जो विश्वास हमारा।
न खून का न मजहब का
ये रिश्ता है मोहब्बत का।
बुढ़ापा बचपन या जवानी
हर दौर की अपनी कहानी
याद करे जो बीते पल
जी उठे फिर से गुजरे कल
हर बुनियाद का ये मुकाम है
दोस्ती इसका नाम है।
जो बंधे है दिल की डोर से
ना खींचो इसको जोर से
सब रिश्तो से ये खास है
अनमोल सा एहसास है
यह रिश्ता है अरमानों का
साथ लिए पैमानों का ।।
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